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बेजबानों के मसीहा - Motivational Story in Hindi

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एक पालतु घोड़े की मौत क्या किसी को वेटरिनरी हर्ब्स मेडिसिन के आविष्कार के लिए मजबूर कर सकती हैं आप जान कर हैरान हो जाएंगे की ये मेडिसिन पिछले छ: दसक से बाज़ार में मौजूद हैं उतरप्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थापित इंडियन हर्ब्स कम्पनी लगातार वैज्ञानिक शोध के जरिये पशु – पक्षियों और जल – जीवो के लिए हर्ब दवाइयों की श्रृंखला बढाती जा रही हैं इसके चेयरमैन सुशील अग्रवाल बताते हैं की वैज्ञानिक शोध और क्लीनिकल ट्रायल के आधार पर वेटरिनरी हर्ब दवाईयां बनाने वाली उनकी कम्पनी सबसे पुरानी हैं

इंडियन हर्ब्स का सबसे पुराना उत्पाद “हिमालय बतीसा” हैं जो मवेशियों के पाचन तंत्र को ठीक रखता हैं आज इंडिया हर्ब्स के उत्पाद को 52 देशों में निर्यात किये जाते हैं सुशील के पिता दिवंगत रामलाल अग्रवाल ने 1951 में “हिमालय बतीसा” को तैयार किया था इसके बाद मवेशियों की विभिन्न बीमारियों और जरूरतों के अनुसार हर्ब्स मेडिसिन पेश करने का सिलसिला लगातार जारी हैं पशुओं की प्रजनन क्षमता और दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए हर्ब दवाइयों का श्रेय भी इंडियन हर्ब्स को जाता हैं पोल्ट्री फार्मिंग और पिग फार्मिंग से लेकर मतस्य पालन से जुडी जरूरतों को भी इंडियन हर्ब्स ने पूरा किया हैं

इंडियन हर्ब्स ने आयुर्वेद वेटरिनरी मरहम “हिमैक्स” बनाया तो यह पहला एंटी – बायोटिक, एंटी – सेफ्टिक और एंटी – फंगल मरहम था जिससे मक्खी और दुसरे किट – पतंगे मरहम लगने के बाद जख्म के पास भी न आये, और इससे दुसरे जानवरों को भी इन्फेक्शन से बचाया जा सके

सुशील के पिता रामलाल दिल्ली रामजस कालेज में पढ़ रहे थे उन दिनों स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम पर था उनके पिता भी अंग्रेजो के खिलाफ इश्तिहार की साइकलोस्टाइल की कापिया निकालते थे इस बात की जानकारी अंग्रेजो को लग गई तो वह चकराता में अपने चाचा के पास जाकर छुप गए चाचा के परिवार में “टारपीडो” नाम का एक घोड़ा था 1946 में घोड़े की कोलिक नाम के रोग से मौत हो गई घोड़े के मौत ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया की आस – पास भरपूर वनस्पति संपदा होने के बावजूद लोग पालतु जानवरों का उपचार क्यों नहीं कर पाते हैं रामलाल अग्रवाल ने इसके लिए उतरप्रदेश के मथुरा के वेटरिनरी कालेज के तत्कालीन प्राचार्य से सम्पर्क किया और रिसर्च प्लान उने सामने रखा इस तरह इंडियन हर्ब्स के पहले उत्पाद के तौर पर हिमालय बतीसा का अविष्कार हुआ आज इंडियन हर्ब्स के 200 से अधिक उत्पाद हैं 

मवेशी बेजबान होते हैं इसलिए अपनी बात किसी से कह नहीं सकते बेजबानो के इसी दर्द को रामलाल अग्रवाल ने समझा और दवा इजाद किया कम्पनी शुरू करने के लिए रामलाल अग्रवाल के सामने पूंजी निवेश की समस्या खड़ी थी उन्होंने अपने जैसे दो लोगो तलाश किये और तीनो में से हरेक ने 516 रूपये का निवेश किया इस तरह लगभग 1550 रूपये से इडस्ट्री की शुरुआत हुई और हिमालय बतीसा के उत्पाद और मार्केटिंग पर फोकस किया गया

1983 में इंडियन हर्ब्स ने अपनी स्वतंत्र प्रयोगशाला स्थापित की और विज्ञान तथा प्रोधोगिकी मंत्रालय के अधीन अनुसंधान और विकाश का कम शुरू कर दिया इसके लिए विदेशो से उच्च श्रेणी की मशीन मंगाई गई 1550 रूपये से शुरू हुई कम्पनी आज 50 करोड़ रूपये से अधिक निवेश वाली बनी और कम्पनी ने पिछले चार सालो में 200 करोड़ का निर्यात किया

इंडियन हर्ब्स को सौ से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार एवं सम्मान मिल चुके हैं कुल मिलाकर 4 - 5 कर्मचारी से शुरू हुई कम्पनी में आज 500 से ज्यादा कर्मचारी हैं कम्पनी के पास आज यूरोप समेत अलग – अलग देशो में 24 हर्ब्स के पटेंट हैं

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